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गुजरात में कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) की बैठक हुई के बाद राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने कहा कि आज एक विशेष प्रस्ताव (सरदार वल्लभाई पटेल को लेकर) पर चर्चा हुई और पारित हुआ. इस प्रस्ताव में सरदार पटेल द्वारा आरएसएस पर लगाए गए बैन का भी जिक्र किया गया है

साथ ही पंडित देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल के संबंधों का जिक्र करते हुए बीजेपी पर हमला भी बोला गया है. आइए जानते हैं सरदार पटेल को लेकर पारित प्रस्ताव ‘ आजादी के झंडाबरदार हमारे सरदार’ की अहम बातें.

साल 1918 में गुजरात के खेड़ा में अंग्रेजों द्वारा किसानों से कर वसूली के विरोध में महात्मा गांधी की प्रेरणा से सरदार वल्लभ भाई पटेल ने आजादी के रण में कदम रखा. फिर उन्होंने 1928 में अंग्रेजी हुकूमत द्वारा किसानों से लगान वसूली के खिलाफ बारदोली सत्याग्रह का नेतृत्व किया. ऊर्जावान और प्रभावशाली नेतृत्व के चलते वो बारदोली आंदोलन से “सरदार” कहलाए.

आज की भाजपा सरकार भी अंग्रेजों की तरह किसानों की भूमि के उचित मुआवजा कानून को खत्म करने का अध्यादेश लाती है. तीन काले कानून बनाती है. किसानों की राहों में कीलें बिछाती है. आय दोगुनी और एमएसपी गारंटी का वादा कर मुकर जाती है.

न्याय मांगने पर लखीमपुर खीरी में भाजपा नेताओं की जीपों से किसानों को कुचलवाती है. इसीलिए, एक बार फिर सरदार पटेल की राह पर कांग्रेस किसान के अधिकारों के लिए निर्णायक संघर्ष को तैयार है.
सरदार पटेल के नेतृत्व और पंडित नेहरू की दूरदर्शिता ने 560 से अधिक खंड-खंड रियासतों का एकीकरण कर लोकतांत्रिक गणराज्य की नींव रखी. आज की भाजपा सरकार फिर देश को क्षेत्रवाद, उत्तर बनाम दक्षिण व पूर्व बनाम पश्चिम विवाद, भाषाई और सांस्कृतिक बंटवारे के नाम पर खंडित करने की साजिश कर रही है. इसीलिए एक बार फिर सरदार पटेल के पथ पर चलकर कांग्रेस ‘नफरत छोड़ो भारत जोड़ो’ की डगर पर बढ़ते जाने को तैयार है.
अंग्रेज सरकार ने भारत के खजाने को लूटकर देश में गरीबी व आर्थिक असमानता को चरम पर पहुंचा दिया था.

सरदार पटेल का विचार था कि भरपूर उत्पादन, संसाधनों का समान वितरण और उत्पादकों के साथ न्यायसंगत व्यवहार ही दूरगामी आर्थिक नीति का हिस्सा हैं. आज की भाजपा सरकार ने जहां तीन दशकों से गुजरात को लूटा, वहीं देश के खजाने का मुंह मुट्टीभर दोस्तों की तरफ मोड़कर आर्थिक असमानता को गुलामी के स्तर तक पहुंचा दिया है. इसीलिए एक बार फिर देश को आर्थिक गुलामी की तरफ धकेलने वाले चंद दौलतमंदों के सिक्कों की खनक के खिलाफ सरदार पटेल की तर्ज पर संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण के लिए कांग्रेस नए संघर्ष को तैयार है.
आजादी में जिन ताकतों ने सत्य-अहिंसा के सिद्धांतों के खिलाफ दुष्प्रचार किया और आजादी के आंदोलन का विरोध किया, उसी हिंसावादी विचारधारा ने महात्मा गांधी की हत्या की थी. नाथूराम गोडसे उसी विकृत विचारधारा से ग्रसित था.

दूसरी ओर देश के उपप्रधानमंत्री सरदार पटेल हिंसा व सांप्रदायिक विचारधारा को राष्ट्रहित का दुश्मन मानते थे. वो सरदार पटेल ही थे, जिन्होंने गांधी जी की हत्या के बाद 4 फरवरी 1948 को आरएसएस पर बैन लगाया था.
उसी समय ऐसी ही हिंसक विचारधारा ने सरदार पटेल और पंडित नेहरू तक पर हमला बोलते हुए दोनों को सार्वजनिक रूप से फांसी पर चढ़ाने की बात कही थी. इसका जिक्र खुद सरदार पटेल ने 8 फरवरी 1948 को अपने पत्र में श्यामा प्रसाद मुखर्जी से किया था. आज फिर हिंसा और सांप्रदायिकता की यह विचारधारा धर्म का बंटवारा कर देश को नफरत की आंधी में झोंकने की साजिश कर रही है. इसीलिए एक बार फिर सांप्रदायिकता के उन्माद को रोकने वाले लौह पुरुष सरदार पटेल के मजबूत इरादों पर कांग्रेस संघर्ष को तैयार है.

(इस खबर को अभिनव भारत न्यूज की टीम ने संपादित नहीं किया है. यह न्यूज डिजिटल मीडिया के माध्यम से सीधे प्रकाशित की हुई है.
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